Gorakhnath Mandir: भारत वह भूमि है जहां त्रेता युग में श्री राम जैसे मर्यादा की मूरत ने जन्म लिया, द्वापर युग में नारायण अपने श्री कृष्ण रुप में अवतारित हुए, इस समस्त पृथ्वी को श्रीमद् भागवत गीता के जरिए युग युगों तक धर्म का ज्ञान दिया। सनातन का गर्भ कहलाए जाने वाले इस देश में आपको ऐसी अनगिनत कथाएं मिल जाएंगी, जिससे आपको विश्वास होगा कि भारत का एक-एक कोना परमात्मा के अंश का हिस्सा है।
देश का कोई भी शहर, गांव या फिर राज्य ही क्यों ना हो, हिंदू मानयता और पुराणों के अनुसार आपको जगह- जगह देवी-देवता का मंदिर तो अवश्य ही देखने को मिलेगा। समाचार नगरी के इस लेख में आप उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में स्थित गोरखनाथ मंदिर के प्राचीन इतिहास, अनसुने तथ्य और पौराणिक कथा से रुबरु होंगे।
वो उत्तर प्रदेश जिसने रामायण को अवध दिया, महाभारत को हस्तिनापुर और श्री कृष्ण के जन्म से जिसका मथुरा वृंदावन प्रसिद्ध हुआ। ये कहानी है उस राज्य की जो पुराणिक इतिहास का वंदन करता है। 2,43,286 km² में फैले इस प्रदेश में 75 जिले हैं, जिन्हें चार भागों में बांटा गया है: पूर्वांचल, अवध, पश्चिम और बुंदेलखंड।
पूर्वांचल वो हिस्सा है, जो कुल 17 जिलों को मिलाकर बनाया गया है। इन्हीं में एक जिला है गोरखपुर, जिसे राजनीति की दुनिया में सीएम योगी का गढ़ भी कहा जाता है।
लेकिन गोरखपुर की असली पहचान इसकी आध्यात्मिक विरासत से है। यही वो भूमि है, जिसका नाम महान योगी गुरु गोरखनाथ के नाम से जुड़ा है। तो अब हम आपको सीधा लेकर चलते हैं ऐसे दिव्य धाम में जिसके नाम पर गोरखपुर का नाम रखा गया।
कौन थे गुरु गोरखनाथ?
गुरु गोरखनाथ इतिहास के एक संत रहे हैं। वो नाथ संप्रदाय का प्रमुख आचार्य माने जाते है। इतिहासकारों के अनुसार उनका काल लगभग 10वीं से 11वीं शताब्दी के बीच था। गुरु गोरखनाथ के गुरु का नाम मत्स्येन्द्रनाथ है। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ ने ही उन्हें योग और साधना का ज्ञान दिया है।

गोरखनाथ जी मानते थे कि योग केवल शारीरिक अभ्यास तक सीमित है। योग को आसान करने से, आप योगी नहीं बन सकते। उनका संदेश था कि योग मन, प्राण और आत्मा की शुद्धि का मार्ग है।
गोरखनाथ जी ने ये ज्ञान दिया कि किसी भी व्यक्ति को पहले अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करना चाहिए, तभी वो सच्चा आत्मज्ञान प्राप्त कर सकता है।
नाथ संप्रदाय और साधना
नाथ संप्रदाय की परंपरा को गुरु गोरखनाथ ने ही स्थापित किया था। नाथ संप्रदाय का पालन संत, साधु और गृहस्थ सभी कर सकते हैं। नाथ योगियों की खास पहचान थी, जिसमें सिर पर जटाएं, कान में कुंडल और तपस्वी जीवनशैली शामिल था। नाथ संप्रदाय का उद्देश्य सिर्फ व्यक्तिगत मोक्ष नहीं, बल्कि समाज में धर्म और आध्यात्मिक चेतना को बढ़ावा देना था।
क्यों प्रसिद्ध है गोरखनाथ मंदिर
इतिहास और कथाओं के अनुसार, गुरु गोरखनाथ ने गोरखपुर में ही यहीं लंबे समय तक तपस्या की। यही कारण है कि गोरखपुर को उनकी तपोभूमि कहा जाता है। यहां स्थापित गोरखनाथ मंदिर और मठ न केवल धार्मिक स्थल है, बल्कि योग, साधना और नाथ परंपरा का प्रमुख केंद्र भी है। क्या आप जानते हैं कि हर साल मकर संक्रांति और गुरु पूर्णिमा के पावन अवसरों पर लाखों श्रद्धालु दर्शन और आशीर्वाद के लिए यहां पहुंचते हैं।
गोरखपुर और गोरखनाथ मंदिर आज भी तपस्या, दिव्यता और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक बने हुए हैं, और ये स्थान शांति, श्रद्धा और साधना के मार्ग की प्रेरणा देता है। इसी वजह से गोरखनाथ मंदिर प्रसिद्ध है।