वो कहते है ना
” मेहनत करने वालों की सफलता “पक्की” होती हैं
युवाओं के हाथ में ही देश की “तरक्की” होती हैं” .

आज एक ऐसे युवा नेता की बात करेंगे जिनकी याचिका पर हाई कोर्ट ने गोरखपुर विश्वविद्यालय को कड़ी फटकार लगाई थी .
आज हम एक ऐसे युवा नेता की बात करेंगे जिसके संघर्ष से पूर्वांचल के ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के युवा प्रेरणा लेते है ।
आज हम ऐसे युवा नेता की बात करेंगे जो राष्ट्र ध्वज के सम्मान के लिए जेल जाता है। बताने के लिए तो अनेकों कारनामे हैं जो इनके नाम पे हैं पर उससे पहले आप जान लीजिए कि हम किसकी बात कर रहे हैं ,हम बात कर रहे हैं गोरखपुर के अनिल दुबे की।

नाम – अनिल दुबे

जन्म स्थल – कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

  • एक जोश से भरा युवा, देश की सेवा करने के अलग अलग संभावनाएं ढूंढता है ,शुरुवात हमेशा लोक सेवा से ही होती है>

अनिल दुबे जिनका जन्म तो कुशीनगर में हुआ पर प्रारंभिक शिक्षा गोरखपुर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में हुई ,पढ़ाई में बचपन से तेज अनिल दुबे हमेसा से लोगों के लिए कुछ बेहतर करना चाहते थे जिसके लिए अनिल दुबे ने भी यूपीएससी (लोक सेवा) की तैयारी करने का मन बना लिया जिससे वो अधिकारी बन लोगों की सेवा कर सकें और पहुंच गए यूपी के “गोरखपुर” से दिल्ली के “मुखर्जीनगर” .

साल 2014 में मुखर्जी नगर की गलियों में घूमने के दौरान एक घटना ने उनकी जिंदगी के रास्ते को बदल दिया,उनके सीनियर से उनकी बात चाय के दुकान पे हो रही थी,चर्चा का विषय था कि किस तरीके से वो सब लोग जो आगे चल कर अधिकारी बनेंगे किस तरीके से वो इस देश मे बदलाव लाएंगे बात बात में उनके एक सीनियर ने ये कह दिया कि हम सब मेहनत करके अधिकारी तो बन जाएंगे पर हमको करना वही पड़ेगा जो एक “नेता” कहेगा तो हम लोग तो कटपुतली बन कर रह जाते हैं और इसी बात ने अनिल को इतना प्रभावित कर दिया कि भविष्य का “IAS” अब “नेता” बनने का सपना सजोए वापस गोरखपुर पहुंच गया।

फ़िर असली संघर्ष की शुरुआत हुई


2015 में तत्कालीन समाजवादी सरकार ने सिपाही भर्ती प्रक्रिया को बदल कर मेरिट के आधार कर दिया जिससे कि प्रदेश के युवाओं में आक्रोश भर गया और युवा इस प्रक्रिया को बदलने के लिए अड़ गए भारी संख्या में युवाओं ने विरोध किया और पूर्वांचल में इस आंदोलन को संभाला अनिल दुबे ने और वो वही समय था जब उस समय के गोरखपुर से तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ ने भी भरी सभा मे युवाओं की लड़ाई की तारीफ की थी।

ऐसे ही तमाम संघर्षों से अनिल दुबे युवाओं के बीच प्रचलित होते चले गए और 2018 में उन्होंने छात्र संघ चुनाव में अध्यक्ष पद पे लड़ने का मन बनाया उस समय तक युवाओं में अनिल दुबे की लोकप्रियता काफी बढ़ गई थी बताया तो येभी जाता है कि 2018 के छात्र संघ चुनाव को केवल इसलिए निरस्त करवा दिया गया था कि अनिल दुबे उस चुनाव में जीत रहे थे।

अपने बेबाक अंदाज़ के लिए जानें जाने वाले “अनिल” छात्रों और शिक्षकों के लिए लड़ाई लड़ते हुए पुलिस की सैंकड़ों लाठियों खाए और अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करते रहे है। बेवजह चुनाव निरस्त हो जाने की वजह से उन्होंने विश्वविद्यालय पारीसर में आंदोलन छेड़ा . हाई कोर्ट भी गए जहां उनकी याचिका की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने विश्विद्यालय प्रशासन को कड़ी फटकार लगाते हुए पूछा कि “विश्वविद्यालय बताएं कि वो छात्र संघ चुनाव कराना चाहता है या नहीं और अगर कराने की मंशा है तो बताएं चुनाव कब होगा” ?


लगातार धरना और प्रदर्शन करने के कारण अनिल दुबे सिस्टम के आंखों में गड़ने लगे थे तभी उस समय उन्होंने विश्वविद्यालय में लहरा रहे फटे झंडे को देख और राष्ट्र ध्वज के सम्मान को बचाने के लिए एसएसपी से मिलने गए जिस समय उन्हें गिरफ्तार कर गंभीर धाराओं में जेल भेज दिया गया,महीने भर जेल में रहने के बाद जब वो निकले तो उनका हौसला टूटा नहीं था बल्कि और बढ़ गया था जिसके बाद जनहित की लड़ाई लड़ते कई बार गिरफ्तार किए गए और उसके बाउजूद वो अपनी आवाज़ प्रखर व बेहतर रूप से उठाते रहे हैं।

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