कैसे एक हॉस्टल में रहने वाले हरिशंकर तिवारी ने अपराध और राजनीति की कराई दोस्ती?

पंडित हरिशंकर तिवारी की कहानी शुरू होती है पूर्वांचल की राप्ती नदी से सटे गोरखपुर जिले से। हॉस्टल के रूम में एक लड़ाई से शुरू हुआ इनका सफर किसको पता था की राजनीति पर जा अटकेगा।

1

योगिता लढ़ा, नई दिल्ली।PANDIT HARISHANKAR TIWARI: उत्तर प्रदेश (UP) एक ऐसा राज्य है जिसकी राजनीति का दरवाजा खटखटाए बिना आप देश की राजनीति को नहीं समझ सकते और इसी राज्य का एक क्षेत्र है पूर्वांचल, जो भारत की राजनीति में माफियाओं की सत्ता की सजावट करता है। उत्तर में नेपाल और दक्षिण मे मध्य प्रदेश के बघेलखंड क्षेत्र से जुड़े हुए, इसी पूर्वांचल में कई माफियाओं की गैंगवार की कहानियां शुरू हुई। उत्तर प्रदेश के इस माफिया राज के पहले पात्र हैं भारतीय राजनीति के विधायक पंडित हरिशंकर तिवारी। जिनके चर्चित होने के बाद लोग खुद को कम और बंदूकों और हथियारों को ज्यादा सवारने लगे थे। भारत में तिवारी के द्वारा ही राजनीति और अपराध का गठबंधन किया गया था।

पंडित हरिशंकर तिवारी (PANDIT HARISHANKAR TIWARI) की कहानी शुरू होती है पूर्वांचल की राप्ती नदी से सटे गोरखपुर जिले से। हॉस्टल के रूम में एक लड़ाई से शुरू हुआ इनका सफर किसको पता था की राजनीति पर जा अटकेगा। देखते ही देखते छात्र राजनीति से निकलकर कुछ सालों में पंडित हरिशंकर तिवारी ब्राह्मणों के नेता बन गए थे और दूसरी ओर वीरेंद्र प्रताप शाही क्षत्रियों के नेता के रूप में देखे गए थे। पंडित हरिशंकर तिवारी के बारे में एक बात प्रचलित है कि तिवारी गरीबों के दिल में और अमीरों के दिमाग में रहते थे। इन्हीं के नक्शे कदम पर चल कर ही मुख्तार अंसारी, रमाकांत यादव, राजा भैया, बृजेश सिंह के माफिया राज की शुरुआत हुई थी।

बात है साल 1985 की। जब देश में ऐसा पहली बार हुआ कि कोई विधायक जेल में था और विधानसभा की सीट उसकी जेब में। एक इंटरव्यू के दौरान तिवारी ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह पर आरोप लगाते हुए कहा था कि “उन्होंने झूठे केस में फंसा कर मुझे जेल भेजा है। कांग्रेस पार्टी से मेरा पुराना नाता है। मैं PCC और AICC का सदस्य था। मैंने इंदिरा जी के साथ काम किया है, लेकिन चुनाव कभी नहीं लड़ा और तत्कालीन राज्य सरकार ने जब मुझे झूठे केस में फसाया, तो जनता के प्यार और दबाव के कारण मुझे चुनाव लड़ना पड़ा।” इस चुनाव में हरिशंकर तिवारी गोरखपुर जिले की चिल्लूपार विधानसभा सीट के लिए खड़े हुए और सलाखों के पीछे रहने के बावजूद वह निर्दलीय उम्मीदवार साबित हुए।

आपको बता दें 80 के दशक में तिवारी पर कुल 26 मुकदमे दर्ज किए गए थे, लेकिन आज तक एक भी आरोप सच साबित नहीं हो पाया है। पुराने पन्नों को पढें तो साहेब सिंह और मटनू सिंह नाम के दो शार्प शूटर तिवारी के लिए काम करते थे और इनकी ही वजह से Harishankar Tiwari की व्हाइट कॉलर वाली छवि बनी रही। तिवारी ने कभी खुद जुर्म नहीं किया और यही वो समय था जब श्रीप्रकाश शुक्ला ने तिवारी से हाथ मिला लिया था। 1990 के दौरान वीरेंद्र शाही और हरिशंकर तिवारी के बीच कई बार लड़ाई हुई और साल 1997 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में दिन के उजाले में विरेंद्र शाही को मौत के घाट उतार दिया गया था। ऐसा माना जाता है श्रीप्रकाश शुक्ला ने हरिशंकर तिवारी के कहने पर ही वीरेंद्र की हत्या की थी। इस हत्याकांड के बाद दोनों गुटों के बीच लड़ाई समाप्त हो गई थी लेकिन साथ ही पूर्वांचल की राजनीति में माफिया राज ने जन्म लिया।

जैसे-जैसे साल आगे बढ़ेHarishankar Tiwari नाम की इस जड़ ने पूरे पूर्वांचल पर कब्जा करना शुरू कर दिया। सरकार चाहे कोई भी हो हरिशंकर तिवारी कि मंत्री की गद्दी हमेशा तय रहती थी। एक समय ऐसा आया कि पूर्वांचल के रेलवे, कोयले सप्लाई, खनन, शराब और कई अन्य ठेके हरिशंकर तिवारी के दबदबे का शिकार बन गए थे। आपको जानकर हैरानी होगी कि हरिशंकर तिवारी का नाम इस मुकाम तक पहुंच गया था की लगातार 22 वर्षों तक वह विधायक चुने गए थे और साथ ही तिवारी राजनाथ सिंह, मायावती और मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल का अहम हिस्सा रहे। कल्याण सिंह की सरकार में साइंस और टेक्नोलॉजी मंत्री का पद भी तिवारी को दिया गया था। इनको किसी माफिया से खतरा नहीं था क्योंकि अगर कोई विरोधी खतरा बनता था तो वह जिंदा ही नहीं बचता था।

लेकिन देखते ही देखते समय के साथ-साथ इनका दबदबा कम होने लगा और 2007 में बसपा पार्टी के एक उम्मीदवार राजेश त्रिपाठी ने इनको, इनके ही इलाके में मात दी। राजेश त्रिपाठी का नाम विख्यात न होने के कारण, यह एक बड़ी बात थी कि बाहुबली को राजनीति में पहली बार हार का सामना करना पड़ा था। इस चुनाव के बाद मानो हरिशंकर तिवारी को जैसे नजर ही लग गई थी। 2012 में हुए अगले चुनाव में भीHarishankar Tiwari को करारी हार का सामना करना पड़ा था। तिवारी तीसरे स्थान पर आ गए थे और एक बार फिर से राजेश त्रिपाठी ने जीत का परचम लहराया।

दो बार लगातार हार का सामना करने के बाद जनता और साथ ही उम्र भी जवाब दे रही थी।Harishankar Tiwari ने अपने दो बेटों भीष्म शंकर तिवारी और विनय शंकर तिवारी के साथ-साथ भांजे गणेश शंकर पांडे के कदम भी राजनीति में रखवा दिए हैं। छात्र जीवन में गोरखपुर में एक किराए के कमरे में रहने वाले पंडित हरिशंकर तिवारी का आज जटाशंकर मोहल्ले में बड़ा मकान है। जिसे पूरे पूर्वांचल में तिवारी हाता के नाम से जाना जाता है।

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here