Jai Bhim: मद्रास हाई कोर्ट में चलने वाले सबसे लंबे केस की क्या थी असल कहानी?

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शामभवी शाही, नई दिल्ली: हाल ही में Amazon Prime Video पर रिलीज़ हुई साउथ-इंडियन फिल्म “जय भीम” की बहुत ही चर्चा हो रही है। इस फिल्म ने The Shawshank Redemption को पिछाड़ कर IMDB पर टॉप फिल्म्स की लिस्ट में पहले नंबर पर अपना नाम दर्ज कर लिया है। इस फिल्म के लीड रोल में सुरिया और लिजोमोल जोस हैं। इनके साथ फिल्म में प्रकाश राज भी एक अहम भूमिका निभा रहे हैं।

बहुत से लोगों को शायद यह पता नहीं होगा कि “जय भीम” एक सच्ची घटना पर आधारित है। इसके पात्र और इसकी कहानी बिलकुल सच है। यह कहानी तमिल नाडू के जंगलों में रहने वाले इरुला जनजाति के एक दांपत्य की है।

इस फिल्म में दर्शाया गया है कि कैसे एक छोटी जाति के 3 लोगों पर चोरी का झूठा इल्ज़ाम लगाकर पुलिस स्टेशन में उन पर बेरहम होकर ज़ुल्म किए जाते हैं। ज़ुल्म हद से इतना बढ़ जाता है कि उनमें से एक आदमी जिसका नाम राजकन्नु होता है उसकी मृत्यु हो जाती है और पुलिस अपने सर से यह बला टालने के लिए उसकी लाश को ठिकाने लगा देती है। यह फिल्म राजकन्नु की पत्नी सेंगनी (असल नाम पार्वती) के अपने पति की मौत की खबर न होने पर उसे ढूंढने और उसके ऊपर से चोरी का इल्ज़ाम हटाने के संघर्ष की है। हर जगह मदद की गुहार लगा कर थक चुकी सेंगनी जैसे तैसे वकील चंद्रू तक पहुंचती है जो उसका केस मुफ्त में लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं और अपनी पूरी मेहनत से इस केस को लड़ते हैं और जीतते भी हैं। इस कहानी में पुलिस डिपार्टमेंट के IG पेरुमलस्वामी ने भी अहम भूमिका निभाई और यह साबित किया की इस देश में केवल भ्रष्टाचारी पुलिस अफसर जो चांद पैसों के लिए एक गरीब की जान लेने को भी तैयार हो जाएं ही नहीं बल्कि कुछ ईमानदार पुलिस अफसर भी हैं जो सच्चाई को सर्वोपरि रखकर किसी अन्य की चिंता न करते हुए लोगों को न्याय दिलाते हैं। जस्टिस चंद्रू के जीवन को इस केस ने बहुत ज़्यादा प्रभावित किया जिसके बाद उन्होंने छोटी जाति के लोगों के हक के लिए आवाज़ उठाई और उनके लिए सारे केस मुफ्त में लड़े।

यह केस मद्रास हाई कोर्ट में चलने वाला आजतक का सबसे लंबा केस रहा है। हालांकि फिल्म में इसे कुछ महीनों का ही दर्शाया गया है इसका अंदाज़ा दर्शक ऐसे लगा सकते हैं कि फिल्म की शुरुआत से लेकर अंत तक सेंगनी गर्भवती दर्शाई गई है। यह केस दरअसल 1993 से 2006 तक यानी की 13 वर्षों तक चला। इस से हम अंदाज़ा लगा सकते हैं की न्यायपालिका में कितनी खामियां हैं। खासतौर पर जब बात आती है छोटे समुदाय के लोगों की।

इस फिल्म में दर्शाया गया है कि किस तरह छोटी जनजाति के लोगों पर हमेशा से ज़ुल्म ढाया गया है और उन्हें हमेशा नीची नज़र से देखा गया है जबकि वह भी हम में से एक हैं। वह भी एक इंसान हैं जिन्हें बाकी सब की तरह ही सांस लेने, समाज में उठने बैठने और बोलने का अधिकार है।

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