भारत का संविधान हमें जितनी आज़ादी देता है शायद ही कोई देता होगा. बोलने की आजादी से लेकर किसी भी धर्म को अपनाने की आज़ादी, अन्याय के खिलाफ़ लड़ने की आज़ादी से लेकर न्याय की माँग करने की आज़ादी .यानी पूरा- पूरी देखें तो भारत का संविधान जनता को कुछ देता है तो वो है आज़ादी और आज़ाद देश के लिए सबसे बुनियादी चीज़ आज़ादी ही है पर क्या इस बुनियाद पर हम कुछ भी करने के लिए आज़ाद है? क्या भारत के किसी नागरिक को अधिकार है कि वो अपनी मन मर्ज़ी से पोर्न देख सकता हैं? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाकर संविधान के गौर्डियन सुप्रीम कोर्ट की कही बातों पर गौर करना होगा. तो आइये चलते है देश के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के द्वारा इस मसले पर अतीत में किये गए टिप्पणी पर-

पोर्न पर सुप्रीम कोर्ट की पुरानी प्रतिक्रिया:

देश में बढ़ते हुए अपराध को देखते हुए सरकार ने 2015 में 857 पॉर्न साइट्स पर बैन लगा दी थी. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का देशभर में लोगों ने खूब विरोध किया था. असर इतना हुआ कि ट्विटर पर 2 दिन तक ये मुद्दा ट्रेंड करता रहा. विरोध को देखते हुए सरकार ने फैसला वापस ले लिया. हालांकि इसके कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने पॉर्न साइट्स पर बैन लगाने से मना कर दिया था.सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि पोर्न साइट्स पर बैन लगाने से “राइट टू पर्सनल लिबर्टी” (Right to personal liberty) का हनन होगा. कोर्ट ने आगे कहा कि कोई भी कोर्ट में खड़ा होकर ये कह सकता है कि मैं 18 साल से ज्यादा हूं और आप मुझे मेरे घर में पॉर्न देखने से कैसे रोक सकते हैं?

क्या है “राइट टू पर्सनल लिबर्टी”?

अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का आश्वासन देता है. ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ शब्द को कई प्रकार के अधिकारों को कवर करते हुए एक बहुत व्यापक आयाम दिया गया है. अनुच्छेद 21 में प्रयुक्त अभिव्यक्ति ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ का अर्थ केवल शरीर की स्वतंत्रता नहीं है, अर्थात, शारीरिक संयम से मुक्ति या जेल की सीमा के भीतर कारावास से मुक्ति या स्वतंत्रता से गिरफ्तारी या हिरासत, झूठे कारावास या गलत कारावास से , लेकिन इसका मतलब इससे कहीं अधिक है. ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ शब्द का उपयोग संकीर्ण अर्थ में नहीं किया जाता है, लेकिन अनुच्छेद 21 में इसका उपयोग करने के लिए एक अनिवार्य शब्द के रूप में उपयोग किया गया है जो कि एक व्यक्ति के अधिकारों की उन किस्मों को करेगा जो एक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ बनाते हैं.

तो क्या वाकई पोर्न देखना निजी मामला है?

पोर्न के मसले पर सुप्रीम कोर्ट की पुरानी टिप्पणी पर नज़र डालें तो हम पाएंगे कि न्यायालय ने कभी भी पोर्न देखने को क्राइम की श्रेणि में नही डाला है. यहाँ तक की सुप्रीम कोर्ट ने इसे किसी की निज़ी मामला होने का हवाला दिया है. यानी पॉर्न देखना कोई बुरी बात या क्राइम नहीं है. ये एकदम से निजी मामला होता है. जैसे आप डिसाइ़ड करते हैं कि आपको क्या खाना है, कहाँ जाना है, क्या पहनना है , किसके साथ रहना है हुबहूँ वैसा ही कुछ पॉर्न के साथ भी है.

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