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क्या है जातिय जनगणना? जिसके ऊपर चल रही है विपक्ष की मीटिंग, जानिए विस्तार में…

आपको बता दें, वर्ष 2015 में कर्नाटक में सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 'सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण' करवाया था। बाद में इसे ही जाति-जनगणना का नाम देकर प्रचारित कर दिया गया।

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Caste census

नई दिल्ली: आपको बता दें, वर्ष 2015 में कर्नाटक में सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ‘सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण’ करवाया था। बाद में इसे ही जाति-जनगणना का नाम देकर प्रचारित कर दिया गया।

साथ ही बता दें कि, मानसून सत्र की कार्यवाही के दौरान बीते 20 जुलाई को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद को बताया था कि जनगणना में एससी (SC) और एसटी (ST) के अलावा अन्य जाति आधारित आबादी की गणना नहीं कराई गई तो इस विषय पर सियासत में नई बहस छिड़ गई है। और खास तौर पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव समेत कई नेता जाति पर आधारित जनगणना कराने की मांग दोबारा उठाने लगे हैं। इन नेताओं का कहना है कि इससे सही मायने में जरूरतमंदों को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक मदद मिलेगी।आपको बता दें, जीतन राम मांझी और रामदास अठावले भी इस मांग को उठा चुके हैं। यही नहीं इससे पहले भी भारतीय जनता पार्टी की नेता पंकजा मुंडे भी इस मांग को उठा चुकी हैं। केंद्र सरकार का कहना है कि जाति आधारित जनगणना नहीं होने के पीछे कुछ तर्क हैं, जिसे माना गया है। साथ ही बिहार में अब कर्नाटक मॉडल का हवाला देकर राज्य स्तर पर जातिगत जनगणना करवाने की मांग होने लगी है।

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इस विषय पर तेजस्वी यादव का कहना है कि यदि केंद्र सरकार जातिगत जनगणना नहीं करवाती है तो बिहार सरकार कर्नाटक मॉडल की तर्ज पर अपने खर्चे पर यह जनगणना करवा सकती है। तो आपको बता दें कि यह कर्नाटक मॉडल है क्या? जिसका उदाहरण अक्सर विपक्षी नेता देते हैं। दरअसल, वर्ष 2015 में सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ‘सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण’ करवाया था। बाद में इसी प्रकार की जनगणना को जाति-जनगणना का नाम देकर प्रचारित कर दिया गया। बता दें कि, सर्वेक्षण तो कराया गया, लेकिन उसके परिणाम सार्वजनिक नहीं किए गए। यह सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण राज्य सरकार ने अपने स्तर पर करवाया था और इसके लिए 162 करोड़ रुपए का खर्चा किया गया था।


क्या कहते हैं वर्ष 2011 जनगणना के आंकड़े?बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अक्सर कहते दिखाई देते हैं कि, देश में आबादी के अनुरूप आरक्षण का प्रावधान किया जाए। वर्तमान समय में पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी सब एक तरफ हैं। इन नेताओं का मानना है कि यह पता चलने पर कि पिछड़ी जातियों में किस जाति के लोगों की संख्या कितनी है और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कैसी है, उनके लिए खास योजनाएं बनाई जा सकती हैं। आपको बता दें कि वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, बिहार की जनसंख्या 10.38 करोड़ थी। इसमें 82.69% आबादी हिंदू और 16.87% आबादी मुस्लिम थी। हिंदू आबादी में 17% सवर्ण, 51% ओबीसी (OBC), 15.7 % अनुसूचित जाति और करीब 1% अनुसूचित जनजाति के लोग शामिल हैं।

यह भी देखें- https://www.youtube.com/watch?v=4PDUFyNduZg

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