मंत्री की हत्या से लेकर मुख्यमंत्री की सुपारी तक… गैंगस्टर श्रीप्रकाश के हिंसात्मक दुनिया की काली कहानी, पढ़ें

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Shri Prakash Shukla

नई दिल्ली। यूपी का नाम देश में जनसंख्या में तो अव्वल पर है ही साथ ही क्राइम के मामले में भी यूपी का कोई तोड़ नहीं है। यूपी की जमीं पर बनी मिर्जापुर जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर आती हैं और धमाका मचाते हुए सबको हैरत में डाल देती हैं। फिल्मों में तो एक ही शहर की कहानी दिल दहला देती है, लेकिन असलियत में यूपी का हर एक शहर बेहद खौफनाक मंजरों को अंजाम देता नजर आता है। कानपुर के विकास दुबे से लेकर कई कुख्यात बदमाशों की कहानी समाचार पत्रों में छप चुकी है और लोग इसे पढ़कर दांतों तले उंगली दबाते देखे जा चुके हैं। इन्हीं में एक नाम गोरखपुर से 55 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव मामखोर के श्री प्रकाश शुक्ला का है, जिसके गांव का नाम तो शायद ही कोई जानता हो, लेकिन इस कुख्यात की कहानी बच्चे-बच्चे की जुबां पर रहती है। बहन को छेड़ने वाले की हत्या कर बदमाश बना ये शख्स उस समय ज्यादा सुर्खियों में आया जब इसने प्रदेश के चीफ मिनिस्टर कल्याण सिंह की सुपारी ले ली। आइए जानते हैं श्रीप्रकाश शुक्ला के क्राइम का पूरा कच्चा-चिट्ठा-

एक दौर था जब यूपी के शहरों में नुक्कड़ से लेकर कॉलेजों तक में श्री प्रकाश शुक्ला के ही चर्चे होते थे। इसकी कहानियां यूं तो कई समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों पर चली हैं, लेकिन इसमें उनके पिता को एक मामूली मास्टर बताया गया है, लेकिन वो कहते हैं ना कि सच्चाई हमेशा वही नहीं होती जो हमें देखने को मिलती है। ठीक ऐसा ही कुछ श्रीप्रकाश की कहानी के साथ भी है। कुख्यात के पिता एक मामूली मास्टर नहीं बल्कि गोरखपुर के नंबर 1 ठेकेदार थे। रुतबे में शान और चाल कमाल ऐसा ही कुछ शौक बदमाश के पिता का भी था। खुराक अच्छी मिलती रही तो श्रीप्रकाश का बचपन भी पहलवानी में निकल गया। लोकल अखाड़ों में अपने दम पर दुश्मन को चारों खाने चित्त कर देने वाला श्रीप्रकाश महज 20 साल की उम्र में पुलिस रिकॉर्ड में आ गया।

साल 1993 में श्रीप्रकाश की बहन को देख एक मनचले ने सीटी बजा दी। जिसको तत्काल श्रीप्रकाश ने मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद वो पुलिस से बचने के लिए बैंकॉक भाग गया। लेकिन कहते हैं ना कि एक बार मुंह पर खून लगा शेर सुधरने के बजाए और भी ज्यादा खूंखार होता चला जाता है। ऐसा ही कुछ इसके भी साथ हुआ। बिहार में मोकामा के सूरजभान में उसे गॉडफादर मिल गया। धीरे-धीरे उसने अपना एंपायर बिल्ड किया और यूपी, बिहार, दिल्ली, पश्चिम बंगाल समेत नेपाल में अपने गैर कानूनी धंधों का काला व्यापार शुरू कर दिया।

लालच बढ़ती चली गई और उसने किडनैपिंग, ड्रग्स और लॉटरी जैसे तिकड़म में भी हाथ मारना शुरू किया। सुपारी किलिंग के दौरान उसने अपने हाथों से करीब 20 लोगों की जानें ली थी। हर एक गैंगस्टर की तरह वो अय्याशी में भी पड़ा और महंगी-महंगी कॉल गर्ल्स के साथ रातें गुजारकर फेमस हो गया। लड़कियों और गाड़ियों के शौक के साथ नवाबी लाइफस्टाइल उसे आम लोगों के बीच पॉपुलर करती चली गई।

विधायक को गोलियों से भूना
महाराजगंज के लक्ष्मीपुर का विधायक वीरेंद्र शाही खुद एक माफिया था। लेकिन 1997 में उसकी काली दुनिया का काला अंत हो गया। 1997 की शुरुआत में श्रीप्रकाश ने लखनऊ शहर में वीरेंद्र शाही को गोलियों से भून दिया। देखते ही देखते शहर के गलियों, नुक्कड़ों और चौकों पर श्रीप्रकाश की ही चर्चा होने लग गई। लोग आपस में बात करतें कि एक नए शख्स ने विधायक को गोलियों से भून दिया। जिसके बाद इसका खौफ लोगों में फैलता ही चला गया।

जानकारी के लिए बता दें कि, श्रीप्रकाश शुक्ला ही पहला ऐसा माफिया था जिसने AK47 का सबसे पहले इस्तेमाल किया था। इसी की वजन STF (Special Task Force) टीम का गठन किया गया। वहीं, STF की ही रिपोर्ट की मानें तो, प्रभा द्विवेदी, रमापति शास्त्री, मार्कंडेय चंद, जयनारायण तिवारी, सुंदर सिंह बघेल, शिवप्रताप शुक्ला, जितेंद्र कुमार जायसवाल, आरके चौधरी, अमरमणि त्रिपाठी, मदन सिंह, अखिलेश सिंह और अष्टभुजा शुक्ला जैसे नेता उसके रिश्तेदार थे।

बिहार के बाहुबली मंत्री की उनके ही शहर में घुसकर हत्या

बिहार सरकार के बाहुबली मंत्री बृज बिहारी प्रसाद का UP के हर क्षेत्र तक सिक्का चलता था। लेकिन उनका अंत भी श्रीप्रकाश शुक्ला ने ही किया। श्रीप्रकाश ने पटना में बाहुबली को गोलियों से भून दिया। 13 जून 1998 को मंत्री साहब इंदिरा गांधी हॉस्पिटल के सामने अपनी लाल बत्ती गाड़ी से उतरे ही थें कि एके-47 से लैस 4 बदमाश उन्हें गोलियों से भून गुड आफ्टरनून कह फरार हो गएं।

STF की टीम के आंखों में झोंकी धूल

वर्चस्व की लड़ाई में श्रीप्रकाश शुक्ला इस कदर अंधा हो गया कि किसी को मौत के घाट उतारना उसके लिए महज एक खेल बन गया। उम्र बितती चली गई, सत्ता का लोभ भी बढ़ता चला गया। खौफ से पूरा शहर दहशत में था साथ ही पुलिस महकमे पर भी सवाल खड़े होने लगे थे। इसी को देखते हुए STF की टीम गठित की गई और उसका अब एक ही मकसद था श्रीप्रकाश शुक्ला जिन्दा या मुर्दा। सारा फोर्स घोड़े ही तरह उसके पीछे दौड़ गया। और आखिरकार 1998 के अगस्त महीने में उसके खिलाफ पुलिस को एक अहम सुराग भी मिल गया। सुराग में पता चला कि श्रीप्रकाश ने दिल्ली के वसंत कुंज में एक फ्लैट लिया है और वो अपनी जगह से कई और बड़े कारनामों को अंजाम देने वाला है।

कहते हैं ना जब अंत करीब होता है तो इंसान का दिमाग भी काम करना बंद हो जाता है। ऐसा ही कुछ कुख्यात माफिया श्रीप्रकाश के साथ भी हुआ। यूं तो उसके पास 14 सिम कार्ड थे लेकिन जिंदगी के आखिरी दिनों में उसने एक ही सिम कार्ड से सबको संपर्क साधा था। 21 सितंबर की शाम को एक मुखबिर ने पुलिस को खबर दी कि अगली सुबह 5:45 बजे श्रीप्रकाश शुक्ला रांची के लिए इंडियन एअरलाइंस की फ्लाइट लेगा। दिल्ली एयरपोर्ट पर घात लगाने STF की टीम तड़के के 3 बजे तैनात हो गई, लेकिन शुक्ला वहां नहीं पहुंचा।

मोहन नगर के पास हुई भारी मुठभेड़
STF की आंखों में धूल झोंककर बच निकला श्रीप्रकाश शुक्ला दोपहर में ही दोबारा पुलिस के निशाने पर आ गया। शुक्ला अब भी अपना वही फोन इस्तेमाल कर रहा था। दोपहर 1.50 बजे उसकी नीली सिएलो कार मोहननगर फ्लाइओवर के पास दिखी तो जहां पुलिस की 5 गाड़ियां पहले से ही तैनात थीं। गाड़ी का नंबर HR26 G 7305 फर्जी था, जो किसी स्कूटर को आवंटित था।

गोलियों की भरमार फिर ढह ही गई श्रीप्रकाश की काली दीवार
अपने अंत वाले दिन गाड़ी खुद शुक्ला ही चला रहा था। जिसके साथ अनुज प्रताप सिंह आगे और सुधीर त्रिपाठी पीछे बैठा था। खतरा महसूस होते ही गाड़ी को तेज स्पीड में हीरो की तरह भगाते हुए श्रीप्रकाश आगे निकला और पुलिस की पहली, दूसरी गाड़ी को चकमा दे दिया। हालांकि इंस्पेक्टर वीपीएस चौहान अपनी जिप्सी उसकी कार के आगे अड़ाने में सफल रहें। खतरा बढ़ता देख शुक्ला ने गाड़ी को बाईं ओर मोड़ा और तेजी से यूपी आवास कालोनी की तरफ भागा। वो आगे-आगे पुलिस पीछे-पीछे ये आंखमिचौली लंबे समय तक चलती रही।

आखिरकार स्टेट हाइवे से एक किलोमीटर हटकर पुलिस ने उसे घेर ही लिया। आखिर समय में भी श्रीप्रकाश ने सीना ताने रिवॉल्वर निकाली। बदमाश ने 14 गोलियां दागीं तो पुलिसवालों ने भी 45 राउंड गोलियां चलती रहीं। 22 सितंबर 1998 को मिनटों में ही श्रीप्रकाश की अपराध की ग्लैमरस दुनिया धाराशाही हो गई। अंत तो हुआ लेकिन आज भी लोग मानते हैं कि अगर उस समय शुक्ला के पास AK47 गन होती तो वो यमराज को पीछे छोड़ आगे निकल जाता।

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